2nd WHO Global Summit on Traditional Medicine: भारत में विश्व स्तर पर पारंपरिक चिकित्सा की नई पहल

भारत 17–19 दिसंबर 2025 को नई दिल्ली में होने वाले दूसरे WHO Global Summit on Traditional Medicine की मेजबानी करेगा। यह सम्मेलन — जिसे World Health Organization (WHO) और भारत सरकार के Ministry of Ayush (आयुष मंत्रालय) द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया जा रहा है — विश्वभर से पारंपरिक, पूरक और समग्र चिकित्सा (Traditional, Complementary and Integrative Medicine — TCIM) के विशेषज्ञों, नीति निर्माताओं, चिकित्सकों और शोधकर्ताओं को एक साथ लाएगा। आयोजन स्थल है Bharat Mandapam, नई दिल्ली।

इस सम्मेलन की तैयारी और पृष्ठभूमि

समझौते और आधिकारिक पुष्टि

25 सितंबर 2025 को, WHO और भारत सरकार ने एक औपचारिक समझौते (MoU) पर हस्ताक्षर कर यह सुनिश्चित किया कि यह सम्मेलन दिसंबर में होगा। इस समझौते में, यह तय हुआ कि यह विश्व सम्मेलन 17–19 दिसंबर 2025 को आयोजित होगा।

यह वर्ष 2023 में आयोजित पहले ग्लोबल समिट की सफलता के बाद एक नयी पहल है — जो पारंपरिक चिकित्सा को आधुनिक स्वास्थ्य प्रणालाओं में शामिल करने की दिशा में एक वैश्विक कदम था।

नेतृत्व और विशेषज्ञ पैनल

इस समिट के लिए WHO ने अगस्त 2025 में 15 विशेषज्ञों की एक स्टियरिंग कमिटी (Steering Committee) गठित की है — जिसमें पारंपरिक चिकित्सा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और नीति के क्षेत्र में अनुभव रखने वाले विशेषज्ञ शामिल हैं। यह कमिटी सम्मेलन की थीम, एजेंडा, शोध व वैज्ञानिक समीक्षा, और रणनीतिक दिशा-निर्देश तय करेगी।

इस साल की समिट का मुख्य विषय है:
“Restoring balance: The science and practice of health and well-being” — यानी, स्वास्थ्य, कल्याण और पर्यावरणीय स्थिरता के दृष्टिकोण से पारंपरिक चिकित्सा के वैज्ञानिक व व्यवहारिक पहलुओं का पुनर्संतुलन।

सम्मेलन का उद्देश्य और संभावित महत्व

यह समिट सिर्फ एक विचार-विमर्श या सांस्कृतिक सम्मान समारोह नहीं है — इसका उद्देश्य पारंपरिक चिकित्सा (Traditional Medicine, TM) को विश्व स्वास्थ्य व्यवस्था में एक वैज्ञानिक, सुरक्षित, और व्यवस्था-आधारित विकल्प के रूप में स्थापित करना है। प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:

  • पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों (जैसे आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्धा, होम्योपैथी आदि) को सुरक्षित, प्रमाण-आधारित (evidence-based) और समावेशी तरीके से राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणालियों में शामिल करना।
  • पारंपरिक चिकित्सा के ज्ञान, अनुसंधान एवं प्रथाओं के लिए एक वैश्विक प्लेटफार्म मुहैया कराना — जिससे विभिन्न देशों की प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों के बीच संवाद, सहयोग और सीख हो सके।
  • नई वैज्ञानिक खोजों, नवाचारों, नीति और विनियमन (regulation), बायोडायवर्सिटी संरक्षण, बौद्धिक संपदा, और भविष्य की तकनीकों (जैसे एआई, जीवविज्ञान) के साथ पारंपरिक चिकित्सा के भविष्य को आकार देना।
  • एक वैश्विक रोडमैप तय करना — यानी, 2025–2034 के लिए तैयार की गई नामक रणनीति WHO Global Traditional Medicine Strategy 2025–2034 को लागू करना।

सम्मेलन में क्या-क्या होगा — एजेंडा और मुख्य आकर्षण

इस समिट में तीन दिनों का कार्यक्रम तय है (17–19 दिसंबर), जिसमें ऑन-साइट (New Delhi) और वर्चुअल (ऑनलाइन) दोनों भागीदारी संभव है।

मुख्य सत्र व विषय

*Plenary Sessions: उद्घाटन समारोह के बाद पहला मुख्य सत्र “Restoring balance: The science and practice of health and well-being” होगा, जो समग्र विषय की नींव रखेगा।
*Parallel Sessions: सम्मेलन के दौरान 16 से अधिक समवर्ती सत्र आयोजित होंगे, जिनमें विषय होंगे — पारंपरिक चिकित्सा और स्वास्थ्य ज्ञान, पारंपरिक चिकित्सा और स्वास्थ्य-तंत्रों में समावेशन, पारंपरिक चिकित्सा द्वारा पर्यावरण और ग्रह स्वास्थ्य, equitable regulation & resource governance, इत्यादि।
Traditional Medicine Discovery Experience: एक एक्स्पो-जालनुमा अनुभव जहाँ उपस्थित लोग विभिन्न पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों, नवाचारों, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक मिश्रणों को देख और समझ सकेंगे।

उद्घाटन से पहले — कूटनीतिक व तैयारी कार्यक्रम

  • 10 नवंबर 2025 को, दिल्ली में एक “Ambassadors’ Reception” आयोजित हुआ था, जिसमें 50 से अधिक विदेशी राजदूतों, उच्च अथॉरिटी के प्रतिनिधियों को आमंत्रित कर समिट की दिशा, वैश्विक महत्व और साझेदारी के अवसर बताए गए।
  • इसके बाद 9 दिसंबर 2025 को दिल्ली में एक Curtain-Raiser प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई, जिसमें आयोजन की रूप-रेखा, थीम, एजेंडा व अन्य तैयारियों का खुलासा हुआ।

क्या उम्मीदें हैं — वैश्विक स्वास्थ्य, नीति व पारंपरिक चिकित्सा के लिए

  1. पारंपरिक चिकित्सा का वैज्ञानिक और नियामक मान्यता-निर्माण

विश्व स्तर पर पारंपरिक चिकित्सा अक्सर विवादित रही है — जहाँ कुछ लोग इसे “पुरानी परंपरा” मानकर नकारते हैं, वहीं कई लोग इसे सुरक्षित और सुलभ इलाज मानते हैं। इस समिट का उद्देश्य पारंपरिक चिकित्सा को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण, साक्ष्य-आधारित (evidence-based) शोध व उचित नियामक व्यवस्थाओं से जोड़ना है, ताकि इसे विश्व स्वास्थ्य प्रणाली में स्वीकार्यता मिले।

यह 2025–2034 की रणनीति के तहत एक वैश्विक रोडमैप का हिस्सा है, जिसमें पारंपरिक चिकित्सा को स्वास्थ्य की सार्वभौमिक पहुँच (Universal Health Coverage) और सामूहिक कल्याण (global well-being) के एजेंडे में जगह दी जाएगी।

  1. स्वास्थ्य असमानता और पहुंच — एक समावेशी मॉडल

विश्व के कई देशों में, पारंपरिक चिकित्सा आज भी सबसे सुलभ और प्राथमिक देखभाल (first point of care) होती है। खासकर ग्रामीण, आदिवासी और कम-विकसित क्षेत्रों में। इस समिट के जरिए WHO एवं सहभागी देशों को यह समझने व साझा करने का मौका मिलेगा कि कैसे पारंपरिक चिकित्सा को सुरक्षित, गुणवत्तापूर्ण और समावेशी तरीके से स्वास्थ्य तंत्र में शामिल किया जाए — ताकि स्वास्थ्य असमानता को कम किया जा सके।

  1. जैव विविधता, सांस्कृतिक ज्ञान और न्यायपूर्ण साझेदारी

पारंपरिक चिकित्सा अक्सर स्थानीय, Indigenous एवं सांस्कृतिक ज्ञान पर निर्भर करती है। सम्मेलन में बायोडायवर्सिटी संरक्षण, ज्ञान-स्वत्व (intellectual property), लाभ-वितरण (benefit-sharing), और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों की रक्षा जैसे सवालों पर चर्चा होगी — जो पारंपरिक चिकित्सा को सिर्फ एक चिकित्सा मॉडल ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक न्याय के पहलू से भी जोड़ेंगे।

  1. नवाचार, प्रौद्योगिकी और भविष्य की चुनौतियाँ

समिट में पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में नये नवाचारों, दवाओं, प्रक्रियाओं, और आधुनिक विज्ञान — जैसे डेटा साइंस, AI, जीवविज्ञान — के प्रयोग की संभावनाओं पर भी चर्चा होगी। WHO ने संकेत दिया है कि यह सम्मेलन पारंपरिक चिकित्सा को सिर्फ “पुरानी या लोक-चिकित्सा” की श्रेणी में नहीं, बल्कि भविष्य की समेकित, वैज्ञानिक स्वास्थ्य प्रणालियों का हिस्सा बनाने की दिशा में है।

भारत की भूमिका और महत्व — क्यों नई दिल्ली में यह सम्मेलन?

  • ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और चिकित्सा विरासत: भारत एक ऐसा देश है जहाँ आयुर्वेद, योग, सिद्ध एवं अन्य कई पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियाँ सदियों से चली आ रही हैं। इनकी वैश्विक स्वीकार्यता और मान्यता बढ़ाने में भारत की भूमिका स्वाभाविक है।
  • निवेशक और नीति-निर्माता दोनों दृष्टिकोण: सरकार (आयुष मंत्रालय) और WHO दोनों मिलकर पारंपरिक चिकित्सा को आधुनिक, evidence-based स्वास्थ्य मॉडल में स्थापित करने की दिशा में काम कर रहे हैं।
  • वैश्विक नेतृत्व: 2023 में पहले समिट की सफलता के बाद, 2025 में दूसरा समिट आयोजित करना भारत की विश्व स्वास्थ्य और पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में नेतृत्व क्षमता को दर्शाता है।
  • वैश्विक स्वास्थ्य चुनौतियों के समाधान: बढ़ती जीवन-शैली सम्बन्धी समस्याएँ — जैसे दीर्घकालीन बीमारियाँ, मानसिक स्वास्थ्य, जीवनशैली रोग — जिनके लिए पारंपरिक चिकित्सा, योग और समग्र स्वास्थ्य मॉडल कारगर हो सकते हैं।

चुनौतियाँ और संभावित विवाद

हालाँकि पारंपरिक चिकित्सा को लेकर उत्साह बढ़ रहा है, लेकिन कुछ चुनौतियाँ और विवाद भी हैं:

  • साक्ष्य-आधारित अनुसंधान की कमी: अभी भी पारंपरिक चिकित्सा के कई पहलुओं पर सीमित वैज्ञानिक अध्ययन उपलब्ध हैं। इसलिए, यह जरूरी है कि समिट में rigorous clinical trials, data collection एवं systematic reviews पर जोर दिया जाए।
  • विनियमन, सुरक्षा एवं गुणवत्ता नियंत्रण: पारंपरिक दवाओं, जड़ी-बूटियों, दवाइयों व प्रक्रियाओं की गुणवत्ता, दुष्प्रभाव, दुष्प्रयोग आदि को लेकर सावधानी आवश्यक होगी।
  • ज्ञान स्वत्व, पारंपरिक ज्ञान व लाभ-वितरण: Indigenous व सांस्कृतिक समुदायों के ज्ञान का उपयोग करने में न्याय, सम्मान और उचित लाभ-वितरण सुनिश्चित करना होगा।
  • एकीकरण बनाम भेदभाव: पारंपरिक चिकित्सा को मुख्यधारा (mainstream) स्वास्थ्य प्रणालियों में शामिल करना है — यह संतुलन बनाना होगा कि आधुनिक चिकित्सा व पारंपरिक चिकित्सा दोनों की ताकत को बनाए रखा जाए, बिना किसी को प्राथमिकता देकर।

मीडिया एवं कूटनीतिक पहल — क्या हो चुका है तैयारी में?

  • 9–10 नवंबर 2025 को दिल्ली में आयोजित राजनयिक (डिप्लोमैटिक) कार्यक्रमों में 50+ देशों के राजदूतों व उच्चायुक्तों को समिट की रूपरेखा बताई गई। इससे यह सुनिश्चित हुआ कि 100+ देशों की भागीदारी केवल मीडिया रिपोर्ट नहीं, बल्कि वास्तविक कूटनीतिक प्रतिबद्धता है।
  • 8 दिसंबर को आयुष मंत्रालय व मीडिया प्रतिनिधियों के लिए Curtain-Raiser आयोजित हुआ, जिसमें समिट थीम, एजेंडा, हिस्सा लेने वालों की संख्या व अपेक्षित चर्चा विषयों का खुलासा किया गया।

सम्मेलन के संभावित परिणाम और विश्व स्वास्थ्य पर प्रभाव

यदि यह समिट सफल रहा — यानी, व्यापक वैज्ञानिक, नीति-निर्माण और नियामक पहलुओं पर सहमति बनी — तो इसके कई सकारात्मक परिणाम हो सकते हैं:

  1. पारंपरिक चिकित्सा को सुरक्षित, वैज्ञानिक, और विश्वसनीय विकल्प के रूप में स्थापित करना।
  2. देशों में स्वास्थ्य-व्यवस्था को समग्र (holistic) व समावेशी (inclusive) बनाना — जिससे स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच अधिक लोगों तक हो सके।
  3. पारंपरिक चिकित्सा और आधुनिक चिकित्सा के बीच संतुलन — preventing over-reliance on pharmaceuticals, promoting preventive, lifestyle-based, person-centred care.
  4. पारंपरिक चिकित्सा क्षेत्र में नवाचार, दवाओं, जड़ी-बूटियों, स्वास्थ्य सेवाओं, उत्पादों और ट्रेडिशनल मेडिसिन उद्योग के लिए नए अवसर।
  5. सांस्कृतिक, पारंपरिक और Indigenous ज्ञान का संरक्षित और न्यायसंगत उपयोग — साथ ही बायोडायवर्सिटी संरक्षण, benefit-sharing, intellectual property frameworks आदि।

इसके अलावा, यह समिट 2025–2034 की अवधि के लिए एक रोडमैप तैयार करेगा — जिसकी नीतियाँ, शोध प्राथमिकताएँ, विनियम, वैश्विक सहयोग और सामूहिक स्वास्थ्य दृष्टिकोण को दिशा देंगी।

निष्कर्ष

दूसरा WHO Global Summit on Traditional Medicine, 17–19 दिसंबर 2025 को नई दिल्ली में हो रहा है, — और यह एक ऐसा महत्वपूर्ण मोड़ है जहाँ पारंपरिक चिकित्सा (Traditional Medicine), आधुनिक विज्ञान, वैश्विक स्वास्थ्य नीति, शोध व नवाचार, और सांस्कृतिक ज्ञान का संगम होने जा रहा है। यह सिर्फ एक सम्मेलन नहीं है — बल्कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक वैश्विक पुनर्मूल्यांकन (re-evaluation) है: किस तरह हम स्वास्थ्य, कल्याण और सामाजिक व पर्यावरणीय स्थिरता को समग्र रूप से देख सकते हैं।

भारत की मेजबानी इस पहल को और भी मजबूत करती है — क्योंकि पारंपरिक चिकित्सा, प्राकृतिक जड़ी-बूटियाँ, आयुर्वेद, योग आदि यहां सदियों से प्रचलित हैं। यदि यह समिट सफल हुआ, तो आने वाले दशक में मानवता के लिए स्वास्थ्य व कल्याण (well-being) का स्वरूप बदल सकता है — केवल रोग निवारण (disease-treatment) नहीं, बल्कि जीवनशैली, पूर्व-रोकथाम, सामुदायिक स्वास्थ्य और प्राकृतिक तरीकों के माध्यम से।

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