CBI ने उन्नाव रेप केस में कुलदीप सेंगर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की

CBI द्वारा उन्नाव रेप केस में कुलदीप सिंह सेंगर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर

सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में कुलदीप सिंह सेंगर के खिलाफ याचिका दायर की — उन्नाव रेप केस में नया मोड़

  1. मामला क्या है?

उन्नाव (उत्तर प्रदेश) का यह मामला 2017 में तब शुरू हुआ जब एक नाबालिग लड़की ने अपने गांव में बलात्कार का आरोप लगाया था। आरोप अल्पकाल में उच्च राजनीतिक पद पर रहे भाजपा के पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर पर लगे, जिन पर गंभीर आपराधिक आरोप — यौन उत्पीड़न, अपहरण और छेड़छाड़ सहित — लगे थे। मामले को बाद में CBI (केंद्रीय जांच ब्यूरो) ने अंतरदलीय जांच के लिए लिया, और 2019 में Trial Court ने सेंगर को आजीवन कारावास (लाइफ इम्प्रिजनमेंट) की सजा सुनाई, साथ ही ₹25 लाख का जुर्माना भी लगाया गया।

सेंगर ने बाद में उच्च न्यायालय में इस सजा को चुनौती दी थी तथा सजा निलंबन यानी बेल पर रिहाई की याचिका दायर की थी, जिसे दिल्ली हाई कोर्ट ने दिसंबर 2025 में मंज़ूर कर दिया। इसी हाई कोर्ट के फैसले को अब CBI ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।

  1. CBI ने सुप्रीम कोर्ट में किसके खिलाफ याचिका दायर की?

CBI ने विशेष अनुमति याचिका (Special Leave Petition – SLP) सुप्रीम कोर्ट में दायर की है, जिसमें हाई कोर्ट के सजा निलंबन और बेल देने वाले आदेश को चुनौती दी गई है। CBI का तर्क है कि हाई कोर्ट का यह निर्णय कानून के स्पष्ट मंशा, POCSO एक्ट के उद्देश्यों तथा न्याय के मौलिक सिद्धांतों के खिलाफ है।

CBI ने अपने याचिका में जैसे प्रमुख बिंदु उठाए हैं:

🔹 दिल्ली हाई कोर्ट का आदेश त्रुटिपूर्ण और कानून के विपरीत है.
🔹 POCSO एक्ट की अनुसूचित व्याख्या और उद्देश्य को हाई कोर्ट ने नजरअंदाज किया.
🔹 सेंगर जैसी पावरफुल और प्रभावशाली व्यक्ति को बेल देकर पीड़िता एवं समाज के लिए गंभीर खतरे का निर्माण हो सकता है.
🔹 सत्ता में रह चुके लोगों पर जिम्मेदारी की अतिरिक्त बंधन होती है, जिसे अदालत ने ध्यान में नहीं रखा.
🔹 सजा निलंबन से पीड़िता के मनोवैज्ञानिक व सामाजिक न्याय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा.

  1. दिल्ली हाई कोर्ट का आदेश क्या था?

दिल्ली हाई कोर्ट ने 23 दिसंबर 2025 को ऐसे आदेश दिए जिनके तहत:

✔️ Trial Court की उम्र कैद की सजा को निलंबित कर दिया।
✔️ सेंगर को बेल (सशर्त रिहाई) दी गई अपील के निपटारे तक।
✔️ बेल के लिए शर्तें रखीं — जैसे ₹15 लाख का पर्सनल बॉन्ड और तीन समान राशि की जमानतदार,
✔️ ज़मानत के दौरान पीड़िता के घर के 5 किमी के दायरे में न आने का निर्देश।

हालाँकि, एक महत्वपूर्ण बात यह है कि सेंगर फिलहाल जेल में ही है, क्योंकि वह एक अन्य मामले में भी सजा भुगत रहा है — जिसमें पीड़िता के पिता की हत्या का मामला शामिल है और उसे 10 साल की सज़ा सुनाई जा चुकी है। अतः उच्च न्यायालय का बेल आदेश तत्काल रिहाई का अर्थ नहीं देता।

  1. CBI द्वारा उठाए गए मुख्य कानूनी और न्यायिक तर्क

CBI ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका में कई मुख्य तर्क दिए हैं:

(i) POCSO एक्ट के उद्देश्य का उल्लंघन

CBI का कहना है कि POCSO (Protection of Children from Sexual Offences Act) एक्ट का मूल लक्ष्य बच्चों के प्रति यौन अपराधों को रोकना तथा दोषियों को कठोर दंड देना है। हाई कोर्ट ने इस लक्ष्य को ध्यान में नहीं रखा और केवल जेल में बिताए गए समय को मापदंड माना। इससे कानून की मूल भावना को कमजोर किया गया।

(ii) सार्वजनिक सेवा और विश्वास का दुरुपयोग

CBI ने यह भी तर्क दिया कि सेंगर जैसा व्यक्ति, जो पहले सार्वजनिक सेवक (MLA) रहा है, उस पर ताकत, पैसे और बाहुबल दोनों हैं। जब ऐसे व्यक्ति की सज़ा निलंबित कर दी जाती है, तो इसका पीड़िता की सुरक्षा व जीवन पर गंभीर जोखिम पैदा होता है।

(iii) पीड़िता के मनोवैज्ञानिक प्रभाव

याचिका में यह भी उल्लेख है कि बेल मिलने से पीड़िता के मनोबल पर गहरा प्रभाव पड़ेगा और यह न्याय व्यवस्था पर भी लोगों का भरोसा कम करेगा। यह केवल एक सज़ा का मामला नहीं है, देश में महिलाओं और नाबालिगों की सुरक्षा की भावना से जुड़े भावनात्मक मुद्दे भी हैं।

  1. विरोध और जन प्रतिक्रिया

इस फैसले के खिलाफ जन प्रतिक्रिया और विरोध भी तेज हुआ है:

🔸 यूथ कांग्रेस और अन्य सामाजिक संगठनों ने कैंडल मार्च और विरोध प्रदर्शन किए।

🔸 दिल्ली हाई कोर्ट के बाहर भी प्रदर्शन हुए, जहाँ पुलिस ने चेतावनी दी कि अगर प्रदर्शनकारी हटने से इंकार करते हैं तो कार्रवाई होगी।

🔸 सामाजिक कार्यकर्ताओं और महिलाओं ने इस फैसले को न्याय के प्रति अपमान और पीड़िता के प्रति असंवेदनशील बताया है।
UP Tak

इसके अलावा, पीड़िता के पति को उसकी कंपनी से निकाल दिए जाने जैसी आरोपों के चलते भी विवाद और बढ़ गया है, जिससे मामला सामाजिक और आर्थिक स्तर पर भी गंभीर रूप ले रहा है।

  1. अब आगे क्या होगा? सुप्रीम कोर्ट की भूमिका

CBI की याचिका अब सुप्रीम कोर्ट में सूचीबद्ध होगी। सुप्रीम कोर्ट:

याचिका पर प्राथमिक सुनवाई कर सकता है
स्थिति की संवैधानिक समीक्षा कर सकता है
हाई कोर्ट के आदेश को स्थगित या रद्द कर सकता है
या अपने विवेकानुसार संयुक्त निर्देश/निर्णय जारी कर सकता है

यह सुनवाई पीड़िता की सुरक्षा, न्याय के सिद्धांतों, कानूनी पूर्वानुमानों और उच्च न्यायालय के आदेश के औचित्य के आधार पर तय होगी।

  1. निष्कर्ष

उन्नाव रेप केस और CBI की सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका सिर्फ़ एक कानूनी टकराव नहीं है, बल्कि भारतीय न्यायपालिका, महिलाओं की सुरक्षा, कानून की प्राथमिकताओं और सामाजिक विश्वास जैसे मुद्दों को केंद्र में लाता है। CBI का कदम यह संकेत देता है कि सजा निलंबन जैसे निर्णय केवल तकनीकी मापदंडों पर नहीं बल्कि कानून की भावना, पीड़िता की सुरक्षा व न्याय के व्यापक सिद्धांतों पर आधारित होने चाहिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *