
डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत के चावल पर टैरिफ की चेतावनी दी — क्या है पूरा परिदृश्य?
अमेरिका में कृषि-आयातों को लेकर फिर एक बार सुर्खियों में आया है White House। 8 दिसंबर 2025 को आयोजित एक कार्यक्रम में अमेरिकी किसान समूहों की शिकायतों के बाद, ट्रम्प ने संकेत दिया कि भारत सहित कुछ देशों से आने वाले चावल (rice) पर नए टैरिफ लगाए जा सकते हैं।
ट्रम्प ने क्या कहा है?
- ट्रम्प ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी किसानों ने उन्हें बताया है कि भारत, वियतनाम, थाईलैंड आदि देशों से सस्ता चावल आयात किया जा रहा है, जिससे अमेरिकी बाजार में चावल की कीमतें गिर रही हैं और घरेलू किसानों को नुकसान हो रहा है।
- उन्होंने पूछा — “भारत को ऐसा करने की अनुमति क्यों दी जा रही है? उन्हें टैरिफ देना होगा।”
- ट्रम्प ने अर्थव्यवस्था एवं किसान हितों की रक्षा को तर्क बना कर यह चेतावनी दी कि अगर भारत ऐसा चावल डंप करना बंद नहीं करता, तो उस पर “भारी शुल्क” लगाया जाएगा।
- इस घोषणा के साथ ही ट्रम्प ने अमेरिकी किसानों के लिए US$ 12 बिलियन का राहत पैकेज भी शुरू किया है — इसे ऐसे किसानों के लिए रखा गया है जो आयातित सस्ते माल से प्रभावित हुए हैं।
पृष्ठभूमि: भारत-अमेरिका चावल व्यापार
- 2025 तक, भारत और अमेरिका के बीच पहले से ही टैरिफी तनाव था। अप्रैल 2025 में अमेरिका ने “रेसिप्रोकल टैरिफ” लागू किया था, जिसमें भारत से आयातित चावल पर करीब 26 % शुल्क (tariff) लगाया गया था।
- फिर अगस्त 2025 से, भारत से निर्यात होने वाली कई वस्तुओं पर, जिनमें चावल भी शामिल था, अमेरिका ने 25 % टैरिफ लगाया था।
- भारत से अमेरिका जाने वाले चावल (बासमती व गैर-बासमती) की मात्रा 2024 में 2.34 लाख टन रही। इस तरह अमेरिका, भारत के कुल निर्यातित चावल का एक बहुत छोटा हिस्सा है।
- पिछले टैरिफ के बावजूद, भारतीय निर्यातक संगठन का कहना था कि यह “अस्थायी बाधा” है — दीर्घकाल में भारतीय चावल निर्यात प्रभावित नहीं होगा।
नया टैरिफ क्यों? अमेरिका के किसानों की नाराज़गी
- अमेरिकी किसानों का आरोप है कि भारत (और अन्य देशों) से सस्ता चावल लाकर अमेरिकी बाजार में “dumping” हो रही है — यानी कीमतों को नीचे ला कर स्थानीय फसलों की कीमतें गिरा दी जा रही हैं।
- उन्होंने सरकार से कहा है कि अगर सस्ते आयात को नहीं रोका गया, तो उनकी खेती घाटे में जाएगी। ट्रम्प ने इस शिकायत को गंभीरता से लिया है और किसानों के हित में कार्रवाई का भरोसा दिलाया है।
- इस कदम को, एक तरह से, अमेरिका की कृषि एवं घरेलू बाजार की रक्षा की दिशा में देखा जा रहा है।
भारत-अमेरिका व्यापार व राजनीति पर असर
- यदि अमेरिका चावल पर नए, ऊँचे टैरिफ लागू करता है, तो भारत से निर्यात (विशेषकर गैर-बासमती) प्रभावित हो सकता है — अमेरिकी बाजार भारत के चावल निर्यातकों के लिए एक महत्वपूर्ण गंतव्य है।
- यह कदम द्विपक्षीय व्यापार वार्ता (trade talks) को और जटिल बना सकता है। वास्तव में, अगले सप्ताह ही अमेरिकी दल भारत आएगा, जो व्यापार समझौतों पर चर्चा करेगा।
- इससे भारत के चावल निर्यातकों और कृषि-क्षेत्र पर असर पड़ने की संभावना है; शेयर बाजार में भी असर दिखने लगा है — भारत के प्रमुख चावल निर्यातकों के शेयर गिरावट के दायरे में आए हैं।
- इसके अलावा, इस कदम को वैश्विक व्यापार में बढ़ते संरक्षणवाद (protectionism) की ओर एक संकेत माना जा रहा है — जो अन्य एशियाई देशों को भी प्रभावित कर सकता है।
भारत के लिए चुनौतियाँ — और विकल्प
- निर्यात दबाव व बाजारी अस्थिरता
- अमेरिकी बाजार में टैरिफ बढ़ने से भारतीय निर्यातकों को अलार्म बज सकती है। विशेषकर गैर-बासमती चावल जिसे ‘सस्ता चावल’ माना जा रहा है, उसकी मांग गिर सकती है।
- शेयर मार्केट में निवेशकों ने पहले ही नकारात्मक प्रतिक्रिया दी है, जिससे कॉर्पोरेट व किसानों दोनों के लिए आर्थिक अस्थिरता का डर है।
- वैकल्पिक बाजार खोजने की जरूरत
- अमेरिका के बजाए भारत को अन्य देशों (यूरोप, मध्य पूर्व, अफ्रीका) में बाजार तलाशने की रणनीति पर जोर देना होगा।
- निर्यातकों को अपने चावल की गुणवत्ता व ब्रांडिंग (जैसे ‘बासमती’ गुणवत्ता) पर ध्यान देना होगा, ताकि मूल्य-प्रतिस्पर्धा के बजाय मूल्य-आधारित प्रतिस्पर्धा की जा सके।
- कूटनीतिक व व्यापार वार्ता मजबूत करना
- आगामी अमेरिका दौरे व द्विपक्षीय बातचीत में भारत को अमेरिकी चिंताओं को समझते हुए समाधान निकालना होगा, ताकि निर्यात को बचाया जा सके।
- साथ ही, भारत को घरेलू किसानों व निर्यातकों को संतुलित समर्थन देना होगा — जहाँ किसानों की मांगों के साथ निर्यातकों की आय सुनिश्चित हो सके।
निष्कर्ष
डोनाल्ड ट्रम्प की नई टैरिफ धमकी — विशेष रूप से भारतीय चावल पर — न सिर्फ एक आर्थिक मुद्दा है, बल्कि यह वैश्विक व्यापार, कूटनीति और भारत-अमेरिका रिश्तों की दिशा बदलने वाला कदम भी हो सकता है।
यदि अमेरिका ने वाकई में टैरिफ बढ़ाए, तो इससे भारत के चावल एक्सपोर्ट्स पर असर पड़ेगा; निर्यातकों व सरकार के लिए अब रणनीति बदलने का समय है — वैकल्पिक बाजार, गुणवत्ता आधारित ब्रांडिंग, और मजबूती से कूटनीतिक वार्ता। भारत को इस चुनौती से निपटने के लिए गण-बुद्धि के साथ आगे बढ़ना होगा।
