
हिमाचल व पंजाब में विरोध प्रदर्शन: कृषि कानूनों को लेकर फिर सड़कों पर उतरे किसान, चंडीगढ़ बना आंदोलन का केंद्र
हिमाचल प्रदेश और पंजाब में एक बार फिर कृषि कानूनों को लेकर राजनीतिक और सामाजिक माहौल गर्माने लगा है। किसान संगठनों ने केंद्र सरकार द्वारा लाए गए कृषि सुधार कानूनों के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन और मार्च की घोषणा की है। खासकर पंजाब-हरियाणा-हिमाचल की साझा राजधानी चंडीगढ़ इस आंदोलन का प्रमुख केंद्र बनने जा रही है, जहां हजारों किसान अपनी मांगों को लेकर एकजुट होंगे।
आंदोलन की पृष्ठभूमि: क्यों फिर सड़कों पर हैं किसान?
कृषि कानूनों का मुद्दा बीते कुछ वर्षों से भारतीय राजनीति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के केंद्र में है। किसान संगठनों का कहना है कि नए कानूनों से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी कमजोर होगी, मंडी व्यवस्था प्रभावित होगी और कॉर्पोरेट घरानों को खेती में अधिक अधिकार मिल जाएंगे।
यद्यपि सरकार इन कानूनों को किसानों के लिए लाभकारी बताती रही है — जैसे कि सीधे बाजार तक पहुंच, बिचौलियों से मुक्ति और बेहतर कीमत — परंतु ज़मीनी स्तर पर बड़े वर्ग का विश्वास अब भी डगमगाया हुआ है।
चंडीगढ़ बना आंदोलन का केंद्र
इस बार प्रदर्शन की रणनीति अलग और अधिक संगठित बताई जा रही है। किसान यूनियनें चंडीगढ़ में शांतिपूर्ण मार्च, धरना और ज्ञापन सौंपने की तैयारी में हैं। शहर में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है, बैरिकेडिंग और ट्रैफिक डायवर्जन की योजना बनाई जा रही है ताकि कानून-व्यवस्था बनी रहे।
प्रमुख मांगें क्या हैं?
किसान संगठनों की मांगें फिर से स्पष्ट रूप से सामने आई हैं:
- MSP को कानूनी दर्जा
- बिजली संशोधन बिल वापस लिया जाए
- कृषि में निजी कंपनियों की भूमिका सीमित हो
- फसल बीमा योजना में सुधार
- किसान कर्ज माफी
- पराली जलाने पर दंडात्मक कार्रवाई खत्म
- डीज़ल व खाद की कीमतों में राहत
किसानों का कहना है कि जब तक उनकी बात नहीं सुनी जाएगी, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।
हिमाचल में भी बढ़ी हलचल
हिमाचल प्रदेश में भी किसानों ने राज्य के प्रमुख जिलों — कांगड़ा, ऊना, सोलन और शिमला — में रैलियों और धरनों की घोषणा की है। बागवानी और दुग्ध उत्पादन से जुड़े किसान भी आंदोलन में शामिल हो रहे हैं। सेब उत्पादकों का मानना है कि निर्यात नीति, भंडारण सुविधाएं और न्यूनतम मूल्य पर सरकारी खरीद को लेकर सरकार का रुख स्पष्ट नहीं है।
प्रशासन की तैयारी
पंजाब और हिमाचल, दोनों राज्यों की पुलिस और प्रशासन अलर्ट मोड में हैं। चंडीगढ़ में:
धारा 144 लागू की जा सकती है
भारी संख्या में पुलिस बल तैनात
ड्रोन से निगरानी
रूट मैप व ट्रैफिक डायवर्जन
सरकार की ओर से बयान आया है कि “प्रदर्शन लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन कानून व्यवस्था से समझौता नहीं किया जाएगा।”
राजनीति भी गर्म
विरोध प्रदर्शनों को लेकर राजनीतिक दल भी सक्रिय हो चुके हैं। विपक्षी दल सरकार पर किसानों की अनदेखी का आरोप लगा रहे हैं, वहीं सरकार इसे “राजनीतिक प्रेरित आंदोलन” बता रही है। पंजाब में विधानसभा चुनावों का असर भी साफ नजर आ रहा है, जहां किसान आंदोलन एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनता जा रहा है।
आम जनता पर असर
चंडीगढ़ और आस-पास के इलाकों में:
स्कूल/कॉलेज बंद
दफ्तर पहुंचना मुश्किल
आवश्यक सेवाओं पर असर
व्यापारियों को घाटा
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि वे किसानों की मांगों से सहानुभूति रखते हैं, लेकिन लंबा आंदोलन आम जनजीवन को प्रभावित करता है।
आगे क्या?
किसान यूनियनों का कहना है कि यदि सरकार बातचीत नहीं करती, तो आंदोलन और व्यापक किया जाएगा — जिसमें रेल रोको, भारत बंद और ट्रैक्टर मार्च जैसे विकल्प भी चर्चा में हैं।
निष्कर्ष
कृषि कानून केवल नीति का मुद्दा नहीं बल्कि करोड़ों किसानों की आजीविका का सवाल है। हिमाचल और पंजाब में होने वाले ये विरोध प्रदर्शन यह दर्शाते हैं कि सरकार और किसान समुदाय के बीच संवाद की कमी अब भी बनी हुई है। चंडीगढ़ में होने वाला मार्च सिर्फ एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि सरकार के लिए चेतावनी भी है कि “किसानों की आवाज को अनसुना करना महंगा पड़ सकता है”।
देश की आर्थिक रीढ़ — किसान — की संतुष्टि और विश्वास बहाली के बिना कोई भी कृषि सुधार सफल नहीं हो सकता। अब देखने वाली बात यह होगी कि सरकार इस बार संवाद का रास्ता अपनाती है या टकराव का।
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