
एथियोपिया ज्वालामुखी राख बादल: भारत की ओर बढ़ता खतरा और DGCA की बड़ी चेतावनी
(1000 शब्दों में विस्तृत ब्लॉग)
अफ्रीका के पूर्वी हिस्से में स्थित एथियोपिया का Hayli Gubbi ज्वालामुखी हाल ही में अचानक सक्रिय हो गया, जिसके बाद भारी मात्रा में राख (Volcanic Ash) वायुमंडल में फैलने लगी। मौसम उपग्रहों और वैश्विक ज्वालामुखी निगरानी एजेंसियों की रिपोर्टों के अनुसार यह राख बादल अब उत्तर-पूर्व दिशा में आगे बढ़ते हुए भारत की ओर रुख कर रहा है। भारतीय विमानन महानिदेशालय (DGCA) ने इसे गंभीर खतरा मानते हुए सभी एयरलाइनों को स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि वे प्रभावित हवाई मार्गों से बचें और आवश्यकतानुसार रूट डायवर्ट करें।
यह घटना केवल विमानन उद्योग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पर्यावरणीय, आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी प्रभाव भी हो सकते हैं। इस ब्लॉग में हम विस्तार से समझेंगे कि यह ज्वालामुखीय राख बादल कैसे बनता है, यह भारत तक कैसे पहुँच रहा है, इसका असर क्या हो सकता है और DGCA ने कौन-कौन से कदम उठाए हैं।
- Hayli Gubbi ज्वालामुखी का विस्फोट — एक अचानक आई चेतावनी
एथियोपिया पूर्वी अफ्रीका के “रिफ्ट वैली” क्षेत्र में आता है, जहां पृथ्वी की पपड़ी लगातार दरारों और हलचलों के कारण अस्थिर बनी रहती है। इसी क्षेत्र में स्थित Hayli Gubbi ज्वालामुखी लंबे समय से शांत था, लेकिन हालिया भूवैज्ञानिक गतिविधियों के कारण अचानक सक्रिय हुआ।
विस्फोट के बाद:
ज्वालामुखी से उच्च तापमान के साथ राख और गैसें कई किलोमीटर ऊँचाई तक वायुमंडल में पहुँच गईं।
राख में सिलिका, सल्फर डाइऑक्साइड और भारी धातुएँ शामिल होती हैं, जो हवा में फैलकर विशाल क्षेत्र को प्रभावित करती हैं।
अंतरराष्ट्रीय उपग्रह एजेंसियों ने राख बादल की पूर्वी दिशा में गति की पुष्टि की है।
- राख बादल भारत की ओर क्यों और कैसे बढ़ रहा है?
ज्वालामुखीय राख हवा के रुख और ऊपरी वायुमंडलीय धाराओं के अनुसार फैलती है। इस समय:
हिंद महासागर क्षेत्र में पश्चिमी पवनें (Westerlies) सक्रिय हैं,
उच्च वायुमंडल में जेट स्ट्रीम्स पूर्व की तरफ गति कर रही हैं।
इसी कारण राख बादल —
पहले सोमालिया,
फिर अरब सागर,
और अब भारत के पश्चिमी व दक्षिणी हवाई मार्गों की ओर बढ़ रहा है।
यह राख बादल जमीन से बहुत ऊपर, यानी 20,000–40,000 फीट की ऊँचाई पर फैलता है — जो कि अंतरराष्ट्रीय उड़ानों की उड़ान ऊँचाई होती है।
- हवाई जहाज़ के लिए ज्वालामुखीय राख कितनी खतरनाक?
ज्वालामुखीय राख धुएँ की तरह सादा कण नहीं है; यह अत्यंत तेज़ धार वाले सिलीकेट कण होते हैं जो इंजन, विंडशील्ड, सेंसर और नोज़ल्स को क्षतिग्रस्त कर सकते हैं।
राख बादल से विमान को इन संभावित जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है:
- इंजन फेल होने का खतरा
राख इंजन के अंदर पिघलकर चिपक जाती है, जिससे इंजन की थ्रस्ट क्षमता अचानक घट सकती है और इंजन बंद भी हो सकता है। इतिहास में कई ऐसे केस हुए हैं जब विमान राख बादल में फँसकर “इंजन स्टॉल” की स्थिति में आ गए।
- विंडशील्ड क्रिस्टलाइजेशन
राख कण हवा की तेज़ गति के साथ विंडशील्ड से टकराकर उसे अपारदर्शी या धुँधला बना देते हैं। इससे पायलट को दृश्यता नहीं मिलती।
- नेविगेशन सेंसर को नुकसान
पिटोट ट्यूब, एंगल सेंसर और आइसिंग इंडिकेटर राख के संपर्क में आकर काम करना बंद कर सकते हैं, जिससे उड़ान सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ता है।
- केबिन एयर क्वालिटी पर असर
सूक्ष्म राख कण केबिन फिल्टर को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे यात्रियों की साँसों पर नुकसान का खतरा बढ़ता है।
- DGCA की चेतावनी — भारत ने कितनी तैयारी की है?
DGCA ने इस स्थिति को गंभीरता से लेते हुए भारत में संचालित सभी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय एयरलाइनों को एडवाइजरी जारी की है। इसके तहत:
- प्रभावित हवाई क्षेत्र से बचने का निर्देश
एयरलाइनों को कहा गया है कि जहां राख बादल की घनत्व अधिक है, वहां से उड़ानें संचालित न हों।
खासकर अरब सागर रूट
और दक्षिण-पश्चिम भारत के ओवर-ओशन कॉरिडोर
- उड़ानों के रूट में बदलाव
एयरलाइंस चाहे तो:
वैकल्पिक मार्ग (Alternate Air Routes)
ऊँचाई में परिवर्तन (Altitude Adjustment)
या उड़ान समय में बदलाव कर सकती हैं।
- रियल-टाइम मॉनिटरिंग की व्यवस्था
DGCA ने IMD और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के साथ मिलकर Volcanic Ash Advisory Center (VAAC) की रिपोर्टों को लगातार ट्रैक करने की व्यवस्था की है।
- विमानों की अतिरिक्त जांच
राख प्रभावित क्षेत्र की यात्रा करने वाले विमानों की इंस्पेक्शन और मेंटेनेंस बढ़ा दी गई है।
- यात्रियों पर संभावित असर
यदि स्थिति बनी रहती है, तो इसका असर यात्रियों पर भी पड़ सकता है:
उड़ानों में देरी
उड़ानों के रद्द होने की संभावना
टिकट की कीमतों में अस्थायी बढ़ोतरी
लंबी दूरी की उड़ानों का समय बढ़ना
भारत और अफ्रीका के बीच कई व्यावसायिक और कार्गो उड़ानें संचालित होती हैं, जिन पर इसका असर पड़ना तय है।
- क्या इसका भारत के मौसम पर भी प्रभाव पड़ेगा?
ज्वालामुखीय राख और गैसें (जैसे SO₂) वातावरण में फैलकर:
सूरज की रोशनी को रोकती हैं,
तापमान में हल्की गिरावट ला सकती हैं।
यदि राख बादल काफी घना हुआ और भारत के ऊपर कुछ दिनों तक बना रहा, तो:
कुछ हिस्सों में धुंध व हल्का स्मॉग
सांस लेने में कठिनाई
संवेदनशील लोगों के लिए स्वास्थ्य खतरे
हो सकते हैं। हालांकि फिलहाल वैज्ञानिकों का मानना है कि इसका मुख्य असर ऊपरी वायुमंडल तक सीमित रहेगा।
- वैश्विक विमानन इतिहास में ऐसे घटनाओं के उदाहरण
ज्वालामुखीय राख से दुनिया पहले भी प्रभावित हो चुकी है:
2010: आइसलैंड का Eyjafjallajökull ज्वालामुखी, जिसने यूरोप की हवाई सेवा कई दिनों तक बंद कर दी।
1991: माउंट पिनातुबो विस्फोट से वैश्विक तापमान में गिरावट दर्ज की गई।
1982: ब्रिटिश एयरवेज फ्लाइट 9 इंजन में राख जाने के कारण हवा में ही ठप पड़ गई थी, लेकिन पायलट ने चमत्कारिक रूप से उसे सुरक्षित उतारा।
इन घटनाओं ने साबित किया कि राख बादल विमानन के लिए एक अदृश्य लेकिन घातक खतरा है।
- आगे की राह — भारत कैसे संभालेगा स्थिति?
भारत के पास मॉनिटरिंग और योजना दोनों मौजूद हैं, लेकिन सतर्कता आवश्यक है:
DGCA और एयरलाइंस लगातार फ्लाइट ऑपरेशनल प्लान अपडेट कर रहे हैं।
उपग्रह चित्रों और VAAC रिपोर्ट्स पर निर्भरता और बढ़ाई गई है।
यात्रियों को समय-समय पर सूचनाएँ जारी की जा रही हैं।
संभावना है कि आने वाले 24–48 घंटे इस पूरी स्थिति में निर्णायक होंगे।
निष्कर्ष
एथियोपिया के Hayli Gubbi ज्वालामुखी से उठा राख बादल भारत की ओर बढ़ रहा है, जिसे देखते हुए DGCA ने पूरी गंभीरता के साथ चेतावनी जारी की है। यह प्रकृति की एक ऐसी शक्ति है जिसे मनुष्य रोक नहीं सकता, लेकिन विज्ञान और तकनीक की मदद से इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है।
विमानन क्षेत्र को फिलहाल उच्च सतर्कता मोड में रहना होगा, और यात्रियों को भी उड़ानों में संभावित बदलाव के लिए तैयार रहना चाहिए। आने वाले दिनों में स्थिति साफ होगी कि यह राख बादल भारत के लिए कितना गंभीर खतरा सिद्ध होता है।
यह ब्लॉग आगे भी अपडेट किया जाएगा जैसे ही नई जानकारी आती है।
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