
१५० साल पूरे — संसद में ‘वंदे मातरम्’ का गौरव और बहस
‘वंदे मातरम्’ — यह गीत १८७५ में पहली बार प्रकाशित हुआ था, और आज भारत में इसे राष्ट्रीय गीत (national song) का दर्जा प्राप्त है।
२०२५ में इस गीत की १५०वीं वर्षगांठ के मौके पर, संसद का शीतकालीन सत्र इसे समर्पित किया गया है। सोमवार (८ दिसंबर) को लोकसभा में विशेष चर्चाएँ हुईं, और मंगलवार (९ दिसंबर) को राज्यसभा में दोपहर १ बजे विशेष बहस प्रस्तावित है।
राज्यसभा में इस बहस की शुरुआत केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह करेंगे। इसके बाद पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेता, और अंत में जेपी नड्डा द्वारा समापन प्रस्तावित है।
सरकार ने इस बहस का उद्देश्य बताया है — “वंदे मातरम् की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, उसके स्वाधीनता-संग्राम में योगदान, और १५० साल की उस यात्रा को उजागर करना जो राष्ट्र और उसकी चेतना से जुड़ी रही है।”
लोकसभा में क्या हुआ — प्रारंभ और प्रतिक्रियाएं
पहले ही दिन — ८ दिसंबर को — लोकसभा में इस पर चर्चा हुई। नरेंद्र मोदी ने इस बहस का उद्घाटन किया। उन्होंने ‘वंदे मातरम्’ को एक ऐसा “मंत्र और नारा” बताया, जिसने स्वतंत्रता संग्राम को ऊर्जा और एकता दी। उन्होंने कहा कि यह १५०-वर्ष की यात्रा हमारे इतिहास, हमारे संघर्ष, और हमारी राष्ट्रीय-चेतना का प्रतीक है।
मोदी ने लोकसभा में कहा कि ‘वंदे मातरम्’ ने केवल एक गीत नहीं, बल्कि उस आंदोलन की आत्मा को संगृहीत किया, जिसने देश को आजाद करवाया।
हालाँकि, लोकसभा में इस बहस के दौरान विरोधी दलों — खासकर Indian National Congress (कांग्रेस) — ने सवाल उठाए कि क्या संसद का समय ‘वास्तविक मुद्दों’ पर होना चाहिए, बजाय इसके कि केवल प्रतीकात्मक गीतों पर बहस हो।
कांग्रेस की यह चिंता थी कि सदन का समय उन मुद्दों पर खर्च होना चाहिए जो देश के वर्तमान विकास, रोजगार, आर्थिक चुनौतियों या सामाजिक न्याय से जुड़े हों, न कि केवल प्रतीक-वाद (symbolism) पर।
‘वंदे मातरम्’ — इतिहास, विवाद और आधुनिक बातचीत
गीत की उत्पत्ति और महत्व
- ‘वंदे मातरम्’ का मूल लेखन १८७० के दशक में हुआ था, और इसे पहली बार १८८२ में प्रकाशित उपन्यास आनন্দमठ में शामिल किया गया।
- यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान एक राष्ट्रीय-जागरण का प्रतीक बना — १९०५ में इसे पहली बार व्यापक रूप से स्वदेशी आंदोलन का सलामनामा माना गया।
- २४ जनवरी १९५० को, संविधान सभा ने ‘वंदे मातरम्’ को आधिकारिक रूप से राष्ट्रीय गीत (national song) के रूप में स्वीकार किया, और इसे राष्ट्रगान से लगभग बराबरी का दर्जा दिया।
विवाद — पहचान, धर्म और राजनीति
हालाँकि ‘वंदे मातरम्’ देशभक्ति का प्रतीक रहा, लेकिन इसके कुछ दोहे धार्मिक पृष्ठभूमि — देवी-देवताओं, हिंदू प्रतीकों — से प्रेरित थे।
इस कारण १९३७ में, उस समय की कांग्रेस-प्रभावित समिति ने गीत के उन भागों को हटाने या सीमित करने का फैसला किया था, ताकि विभिन्न धार्मिक और साम्प्रदायिक समूहों की भावनाओं का सम्मान हो सके।
इसके बाद से ‘वंदे मातरम्’ को लेकर समय-समय पर बहस होती रही — जहाँ एक ओर इसे राष्ट्र एकता का प्रतीक माना गया, वहीं दूसरी ओर कुछ सामाजिक-सांस्कृतिक समूहों ने इस पर आपत्ति जताई कि क्या इसे जबरदस्ती धर्मनिरपेक्षता से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
आज भी — १५० साल बाद — उसी द्वंद्व का परिदृश्य सामने है: एक तरफ गौरव, राष्ट्रीय पहचान, ऐतिहासिक सम्मान; दूसरी ओर — धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक समावेश, संवेदनशीलता।
इस बहस का वर्तमान परिप्रेक्ष्य — 2025 में क्यों फिर चर्चा
इस साल का १५०-वर्ष का जश्न, और संसद में इस विषय के लिए विशेष समय देने का फैसला, इस तथ्य को रेखांकित करता है कि ‘वंदे मातरम्’ अब केवल एक गीत नहीं रह गया — यह १९वीं से २१वीं सदी तक भारत की राजनीतिक और सांस्कृतिक यात्रा का दर्पण बन गया।
सरकार इसे एक ऐसे ऐतिहासिक प्रतीक की तरह देख रही है, जो नई पीढ़ियों को आजादी के संघर्ष, देश की संस्कृति, और एकता-संविधान की भावना से जोड़ सके।
दूसरी ओर, विपक्ष और कई समाज-संगठनों का कहना है कि इस तरह की बहसें वॉक-इन वोट बैंक, प्रतीकात्मक राजनीति, या सांप्रदायिक संदेशों का नया स्वर हो सकती हैं — खासकर जब ये बहसें ऐसा समय हो रही हैं जब देश के कई संवेदनशील मुद्दे (आर्थिक, सामाजिक, धर्म-साम्प्रदायिक) सुर्खियों में हैं।
इसलिए, राज्यसभा में आज होने वाली बहस को केवल एक औपचारिक या उत्सव-कार्यक्रम के रूप में नहीं देखा जा रहा — बल्कि इसे एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक मोड़ माना जा रहा है, जो स्थापित सीमाओं, पहचान-वाद, और राष्ट्र-मूल्यों को फिर से तय कर सकता है।
राज्यसभा बहस — क्या उम्मीदें, क्या संभावनाएं
- पहले वक्ता के रूप में अमित शाह — जो बहस की शुरुआत करेंगे — से उम्मीद की जा रही है कि वे ‘वंदे मातरम्’ के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय महत्व को दोबारा रेखांकित करेंगे। वे बताएंगे कि कैसे यह गीत सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि भारत की आजादी, एकता और विविधता की एक चुनौती रहीं।
- अन्य भाजपा नेताओं: वरिष्ठ नेता (जैसे राधामोहन दास अग्रवाल, लक्ष्मण, घनश्याम तिवारी, सतपाल शर्मा) — वे संभवतः इस बहस को आगे बढ़ाएंगे, और इस बात पर जोर देंगे कि ‘वंदे मातरम्’ को न केवल आदर, बल्कि सक्रिय रूप में जीवन और व्यवहार में अपनाना चाहिए।
- समापन में, जेपी नड्डा — बहस का समापन प्रस्तावित — राष्ट्रीय गीत की १५०-साल की यात्रा, its आधुनिक प्रासंगिकता, और भविष्य की पीढ़ियों के लिए इसके महत्व को रेखांकित करेंगे।
चुनौतियाँ और संवेदनशीलताएं
यह बहस जितनी प्रतीकात्मक है, उतनी ही संवेदनशील भी। कुछ चुनौतियाँ निम्न-प्रकार हो सकती हैं:
- धार्मिक/सांप्रदायिक भावनाएँ — जैसा कि इतिहास में देखा गया, ‘वंदे मातरम्’ के कुछ भागों में देवी-देवतागण का उल्लेख है, जिसने पहले भी विवाद खड़ा किया था। ऐसे में, इस बहस में धार्मिक और सांस्कृतिक संवेदनशीलता बरतने की जरूरत है।
- प्रतीकात्मक बनाम व्यावहारिक बहस — कुछ आलोचक कहते हैं कि संसद को उन असली समस्याओं (गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक न्याय) पर चर्चा करनी चाहिए, बजाय गीत-गीताफों पर।
- सांप्रदायिक ध्रुवीकरण — अगर बहस सही तरीके से नहीं संभाली गई, तो यह बहस सांप्रदायिक तनावों या पहचान-आधारित विवादों को फिर हवा दे सकती है।
- युवा और भावी पीढ़ियाँ — यह देखना होगा कि ‘वंदे मातरम्’ सिर्फ गर्व और इतिहास के लिए याद किया जाए, या इसे आधुनिक भारत की बहुलतावादी पहचान, संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक समरसता के साथ जोड़ने का प्रयास हो।
निष्कर्ष — क्या है इस बहस की असली अहमियत
‘वंदे मातरम्’ — चाहे आप इसे इतिहास, संस्कृति, राष्ट्र-भावना या पहचान के दृष्टिकोण से देखें — यह गीत भारत के लिए मात्र एक गीत नहीं; यह एक प्रतीक है। १५० साल की लंबी यात्रा में इसे अनेक बार देश की एकता, स्वाधीनता, और राजनीति की कसौटी पर परखा गया।
राज्यसभा में आज होने वाली यह बहस — जिसमें अमित शाह, अन्य नेता, और भविष्य में आने वाली पीढ़ियों की संवेदनाओं को ध्यान में रखा जाएगा — इस बात की परीक्षा है कि क्या भारत अपने प्रतीकों को सिर्फ उन दिनों की याद में ही नहीं बल्कि वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों और पहचान के साथ जोड़ सकता है।
एक तरह से — यह बहस सिर्फ वंदे मातरम् पर नहीं, बल्कि भारत की आत्म-पहचान, विविधता-स्वीकार, और संविधान के अधीनता (secular, inclusive India) पर है।
