सुप्रीम कोर्ट में आज: केरल की याचिका — BLO पर दबाव व सजा देने के आरोपों पर सुनवाई

आज Supreme Court of India (SC) में Election Commission of India (ECI) द्वारा शुरू की गई मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया — Special Intensive Revision (SIR) — को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई हो रही है। इस सुनवाई की पृष्ठभूमि में मुख्य आरोप हैं कि SIR प्रक्रिया के दौरान BLO (बूथ-लेवल ऑफिसर) पर अनुचित दबाव डाला जा रहा है, सजा देने और नौकरी से हटाए जाने की धमकियाँ दी जा रही हैं। इसमें यह भी दलील दी गई है कि यह सब BLO की स्वतंत्रता एवं निष्पक्षता को प्रभावित करता है।

पृष्ठभूमि: SIR क्या है, और क्यों विवादित हुआ?

मतदाता सूची समय-समय पर अद्यतन होती रही है; लेकिन 2025 में ECI ने 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR की प्रक्रिया शुरू की — जिसके तहत घर-घर जाकर मतदाता सूची पुनरीक्षित की जाएगी, मृत या पुराने नाम हटाए जाएंगे, नए मतदाताओं को जोड़ा जाएगा, और सूची की विश्वसनीयता बढ़ाने की कोशिश की जाएगी।
हालाँकि, इस बार SIR के व्यापक दायरे और कम समय-सीमा को लेकर कई राज्यों में विरोध हुआ — विशेष रूप से Kerala (केरल) में, जहाँ स्थानीय निकाय चुनावों के कारण मतदाता सूची पुनरीक्षण को स्थगित करने की मांग की गई। याचिकाकर्ता यह कह रहे हैं कि चुनाव और SIR को एक साथ चलाने से व्यवस्था प्रभावित होगी।

BLOs पर आरोप — क्यों यह विवाद का केंद्र बना?

याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि SIR की दवाब-भरी समयसीमा और गृह-गृह सर्वेक्षण की जिम्मेदारी के चलते BLOs पर अत्यधिक काम का बोझ और दबाव है। कुछ BLOs पर यह आरोप भी है कि उन्हें सज़ा, नौकरी से हाथ-धोने या निलंबन की धमकी दी गई है यदि वे समय पर काम पूरा नहीं कर पाते।

अतिरिक्त दलील यह भी है कि SIR के दौरान कई BLOs की मौतें हो चुकी हैं — कुछ तनाव, अत्यधिक काम और मानसिक बोझ के चलते आत्महत्या, दिल-घाटी या अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर चुके। याचिकाकर्ता इसे SIR की प्रक्रिया के मानवीय, कानूनी और संवेदनशील पहलू का हिस्सा बताते हैं।
इस प्रकार, BLO की स्थिति को ‘निष्पक्ष मतदान प्रक्रिया की रीढ़’ मानते हुए, यह तर्क दिया गया है कि इस तरह का दबाव लोकतंत्र और चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता के लिए खतरनाक हो सकता है।

केरल की याचिका — क्या मांगी जा रही है?

केरल सरकार — साथ ही कुछ राजनीतिक दलों और याचिकाकर्ताओं — ने SC से अनुरोध किया है कि SIR प्रक्रिया को उस राज्य में स्थानीय निकाय चुनावों के बाद स्थगित किया जाए। उनका तर्क है कि चुनाव प्रबंधन, मतदाता सूची अद्यतन, पुलिस और प्रशासनिक संसाधन — सब कुछ एक साथ होने से चुनाव व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
उनकी याचिका में यह भी कहा गया है कि SIR की प्रक्रिया को बिना पर्याप्त समय, संसाधन, और BLOs की स्थिति पर ध्यान दिए हुए लागू करना अनैतिक और संवेदनहीन है। BLOs को बार-बार फॉर्म बाँटना, डेटा एंट्री करना, रात-दिन काम करना, सैकड़ों मतदाताओं से संपर्क करना — ये सब असहनीय है।
ECI और SEC का रुख — जवाब और दलीलें

दूसरी ओर, ECI ने SC के समक्ष दलील दी है कि स्थिति वास्तव में याचिकाओं में बताई गई जैसी नहीं है। उनका कहना है कि केरल में 99% से ज़्यादा मतदान फॉर्म वितरित किए जा चुके हैं, और 50% से अधिक डेटा पहले ही डिजिटाइज हो चुका है, जिससे SIR प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुके है।
इसके अलावा, उन्होंने कहा कि स्थानीय चुनाव, मतदाता संशोधन और मतदान प्रक्रिया — ये सभी संवैधानिक और आवश्यक लोकतांत्रिक अभ्यास हैं; उन्हें रोकना उचित नहीं होगा। ECI ने आरोप लगाया कि कुछ राजनीतिक दल डर और भ्रम फैला रहे हैं, जबकि वास्तविक उद्देश्य मतदाता सूची को साफ़ करना है।
राज्य निर्वाचन आयोग (State Election Commission, SEC) ने भी SC को बताया कि स्थानीय निकाय चुनाव सुचारू रूप से चल रहे हैं। उन्होंने भरोसा दिलाया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने और चुनाव प्रबंधन के लिए पर्याप्त व्यवस्था है। फिर भी, उन्होंने ECI को अनुरोध किया कि SIR गतिविधियाँ चुनाव के काम को प्रभावित न करें।

अदालत का रुख — जनता के हित, संवेदनशीलता, और प्रक्रिया की पारदर्शिता

SC ने याचिकाओं की सुनवाई के दौरान दिखाया कि वह BLOs की स्थिति, SIR की विधिवत प्रक्रिया और चुनाव प्रबंधन — इन सब पहलुओं को गंभीरता से देख रहा है। अदालत ने ECI और संबंधित आयोग से कहा कि वे 1 दिसंबर तक विस्तृत जवाब और स्थिति-रिपोर्ट दाखिल करें।
हालाँकि, SC ने यह स्पष्ट किया कि बिना ECI की दलील सुने, SIR को पूरी तरह रोकने जैसे आदेश देने से बचा जाएगा। अदालत ने कहा कि यदि ज़रूरत होगी तो सुधारात्मक कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन पूरी प्रक्रिया को ठप करना न्यायालय की प्राथमिकता नहीं है।
केरल के मामले की अगली सुनवाई आज — 2 दिसंबर 2025 — निर्धारित है। इस सुनवाई में यह तय होगा कि SIR की प्रक्रिया पर रोक लगेगी या नहीं, या फिर उसमें संशोधन/पर्याप्त सुरक्षा उपायों के निर्देश होंगे।

इस विवाद की व्यापक चुनौतियाँ और संवेदनशील पक्ष

यह मामला सिर्फ एक प्रशासनिक या तकनीकी विवाद नहीं है — इसके कई कानूनी, मानव-अधिकार, लोकतांत्रिक, और राजनीतिक पहलू हैं:

  • मानवीय पक्ष: BLO जैसे कर्मचारियों की हालत — जिन पर घर-घर जाकर काम करने, कम समय में भारी फॉर्म भरने, डेटा एंट्री, पोर्टल क्रैश, दोबारा काम, रात-रात जागने, और वरिष्ठ अधिकारियों का दवाब — इतना बढ़ गया है कि कई BLOs स्वास्थ्य व मानसिक दुष्प्रभाव झेल रहे हैं। कुछ ने इस्तीफा दिया, कुछ मृत्यु तक — यह दिखाता है कि वोटर सूची संशोधन सिर्फ तकनीकी कार्य नहीं, बल्कि मानव संसाधन का बोझ है।
  • लोकतांत्रिक पक्ष: मतदाता सूची में फर्जी नाम, मृतकों का नाम, डुप्लिकेट प्रविष्टियाँ — ये लोकतंत्र की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए सूची सुधार आवश्यक है। लेकिन, ऐसी प्रक्रिया जो लोगों को डराए, भेदभाव करे, या निष्पक्षता पर असर डाले — वह लोकतंत्र की आत्मा के खिलाफ है।
  • प्रक्रियात्मक पारदर्शिता: SIR जैसा व्यापक बदलाव तभी स्वीकार्य है, जब पूरी प्रक्रिया पारदर्शी हो — काम के बोझ, समयसीमा, जिम्मेदारियों, सुरक्षा, स्वास्थ्य, और संसाधन आदि को ध्यान में रखते हुए। यदि प्रक्रिया केवल संख्या बढ़ाने या वोटर सूची ‘साफ़’ दिखाने के लिए हो, तो यह लोकप्रियता अभियान ही कहलाएगी, न कि लोकतांत्रिक सुधार।
  • न्यायिक संवेदनशीलता और संतुलन: अदालत का काम है संवैधानिक अधिकार, मानवता, और प्रशासनिक आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाना। इस मामले में SC का रुख देखना महत्वपूर्ण है — क्या वह BLOs की सुरक्षा और लोकतांत्रिक सिद्धांतों की रक्षा को प्राथमिकता देगा, या मतदाता सूची की “स्वच्छता” को पहले स्थान देगा। आज की सुनवाई — क्या हो सकते हैं संभावित परिणाम?

कुछ संभावित निष्कर्ष या दिशाएँ जिन्हें आज की सुनवाई में देखा जा सकता है:

  1. SIR स्थगित करना — यदि SC BLOs की स्थिति, लोकल चुनाव, और कार्यभार के दबाव को संवेदनशील पाती है, तो SIR प्रक्रिया को केरल में स्थगित या सीमित करने का आदेश दे सकती है।
  2. संशोधित निर्देश — जैसे ज़्यादा समय देना, कार्यभार बांटना, डेटाबेस प्रबंधन को आसान बनाना, BLOs की सुरक्षा और कल्याण सुनिश्चित करना।
  3. पुलिस/प्रशासनिक निरीक्षण — यदि आत्महत्या व मौतों की सूचना सत्य पायी जाती है, तो SC आयोग या राज्य सरकार से स्थिति की जांच करा सकती है।
  4. SIR जारी रखने का आदेश — यदि ECI समझा पाए कि प्रक्रिया सही तरीके से हो रही है और कार्यभार सामान्य है, तो SC इसे जारी रखने की मंजूरी दे सकती है — साथ में आश्वासन या निगरानी व्यवस्था के निर्देश के साथ। निष्कर्ष: लोकतंत्र, ज़िम्मेदारी और संवेदनशीलता का संयोजन

यह मामला दिखाता है कि मतदाता सूची सुधार — जो लोकतंत्र के लिए आवश्यक हो सकता है — यदि बिना संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण के किया गया, तो वह लोकतंत्र के मूल्यों के खिलाफ हो सकता है। BLOs जैसे मामूली कर्मचारी, जो मतदान प्रणाली की रीढ़ होते हैं, यदि दबाव, भय, तनाव या अमानवीय परिस्थिति में काम करते हैं, तो यह सिर्फ “सिस्टम सुधार” नहीं, बल्कि मानवाधिकारों का उल्लंघन होगा।
आज की सुनवाई इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि SC का फैसला — चाहे SIR निरस्त हो, स्थगित हो, या पुनर्निर्धारित हो — इस बात का संकेत होगा कि भारत में लोकतंत्रीय सुधारों में मानवता और संवेदनशीलता कितनी मायने रखती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *