
सांस्कृतिक पहचान: भारत की पहल — सामाजिक, मानवाधिकार, स्वास्थ्य तथा समावेशी विकास के मद्देनज़र भारत अपनी भूमिका मजबूत कर रहा है
नई दिल्ली, 11 दिसंबर —
भारत वैश्विक परिदृश्य में अपनी सांस्कृतिक पहचान को मज़बूत करने के साथ-साथ सामाजिक, मानवाधिकार, स्वास्थ्य और समावेशी विकास के क्षेत्रों में अग्रणी भूमिका निभाने की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की बढ़ती सक्रियता, घरेलू नीतियों में नवाचार और सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों से निपटने की मजबूत इच्छा शक्ति ने उसे दुनिया के सामने एक जिम्मेदार, संवेदनशील और नेतृत्वकारी राष्ट्र के रूप में स्थापित किया है।
सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक मंचों पर बल
भारत अपनी ‘सॉफ्ट पावर’ कूटनीति के जरिए विश्व में अपनी सांस्कृतिक, सभ्यतागत और आध्यात्मिक विरासत को नए रूप में स्थापित कर रहा है।
- अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की वैश्विक सफलता
- आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा को लेकर बढ़ती रुचि
- भारतीय भाषाओं, त्योहारों, साहित्य और कला की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती स्वीकार्यता
हाल ही में पारंपरिक चिकित्सा पर होने वाला WHO Global Summit भारत की इस दिशा में बढ़ती भूमिका को दर्शाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की बहु-सांस्कृतिक पहचान, विविधता और लोकतांत्रिक मूल्य विश्व को एक संतुलित, शांतिपूर्ण तथा सहयोगी मॉडल प्रदान कर सकते हैं।
सामाजिक क्षेत्र में मजबूत पहल
भारत सरकार ने पिछले एक दशक में सामाजिक कल्याण के अनेक कार्यक्रमों को गति दी है।
- बेटी बचाओ–बेटी पढ़ाओ,
- स्वच्छ भारत,
- उज्ज्वला योजना,
- प्रधानमंत्री आवास योजना,
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020,
जैसी योजनाओं ने समाज के निम्न और कमजोर वर्गों के लिए नई दिशा प्रदान की है।
इन योजनाओं ने ग्रामीण महिलाओं में आत्मनिर्भरता बढ़ाई, शिक्षा में अवसरों को अधिक समावेशी बनाया और बुनियादी सुविधाएं बड़े पैमाने पर सुनिश्चित कीं।
विशेष बात यह है कि सरकार की सामाजिक नीतियों में अब समुदाय-आधारित विकास, जन-भागीदारी और डिजिटल पारदर्शिता को केंद्रीय महत्व मिल रहा है, जिससे कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में प्रभावशीलता बढ़ी है।
मानवाधिकार: भारत की वैश्विक प्रतिबद्धता मजबूत
हाल ही में UNHRC में भारत का पुनः चुनाव विश्व समुदाय द्वारा भारत पर जताए गए भरोसे को दर्शाता है। भारत ने इस मंच पर अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि मानवाधिकारों का संरक्षण “लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान में निहित समानता” के आधार पर होना चाहिए।
भारत ने दुनिया को यह बताया है कि मानवाधिकार सिर्फ कानूनी ढांचे तक सीमित नहीं हैं, बल्कि
- गरीबी उन्मूलन,
- शिक्षा का अधिकार,
- स्वास्थ्य सुविधा,
- पोषण और साफ पानी,
जैसे बुनियादी अधिकार भी मानवाधिकारों की मूल भावना का हिस्सा हैं।
भारत ने डिजिटल युग में गोपनीयता, साइबर सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रताओं के बीच संतुलन बनाए रखने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।
स्वास्थ्य क्षेत्र में भारत की उभरती नेतृत्वकारी भूमिका
भारत ने कोविड-19 महामारी के दौरान विश्व का ‘फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड’ होने का परिचय दिया।
- वैश्विक स्तर पर वैक्सीन मैत्री अभियान,
- किफायती दवाइयों का निर्यात,
- स्वास्थ्य अनुसंधान में नवाचार,
- आयुष मंत्रालय और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को बढ़ावा,
इन सभी ने भारत की स्वास्थ्य-निपुणता और नेतृत्व को और अधिक स्थापित किया है।
अब आगामी WHO Global Summit में भारत पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में “साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण” को बढ़ावा देने की तैयारी कर रहा है। यह भारत को स्वास्थ्य कूटनीति का एक प्रमुख केंद्र बना सकता है।
समावेशी विकास: भारत की मूल रणनीति
भारत की विकास नीति का आधार ‘सबका साथ, सबका विकास’ पर टिका है। अर्थव्यवस्था की तेज़ गति से बढ़ोतरी को समाज के हर वर्ग तक पहुंचाने का प्रयास लगातार जारी है।
- डिजिटल इंडिया ने बैंकिंग, सेवाओं और सरकारी योजनाओं तक पहुंच आसान बनाई।
- मुद्रा योजना और स्टार्टअप इंडिया ने युवा उद्यमियों में नया आत्मविश्वास भरा।
- सामाजिक सुरक्षा में पीएम–किसान, आयुष्मान भारत और ई-श्रम पोर्टल जैसे कदमों ने करोड़ों परिवारों को सुरक्षा कवच प्रदान किया है।
भारत अब ‘ग्रामीण–शहरी संतुलन’, ‘हरित विकास’ और ‘सतत ऊर्जा’ के साथ एक समावेशी आर्थिक मॉडल की ओर बढ़ रहा है, जिसका उद्देश्य विकास के फलों को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना है।
वैश्विक कूटनीति में सांस्कृतिक और विकासात्मक नेतृत्व
भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आज एक ऐसे देश के रूप में उभर रहा है जो न केवल अपनी समस्याओं को हल कर रहा है, बल्कि वैश्विक चुनौतियों का भी समाधान प्रस्तुत कर रहा है।
- जलवायु परिवर्तन
- वैश्विक स्वास्थ्य
- साइबर सुरक्षा
- लैंगिक समानता
- सतत विकास
इन मुद्दों पर भारत ने अपनी आवाज़ को मुखर और प्रभावी रूप से रखा है। G20 में भारत की अध्यक्षता के दौरान ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की अवधारणा ने वैश्विक एजेंडा को मानवीय और सहयोगी दिशा दी।
नए भारत की दृष्टि: पहचान, विकास और नैतिक नेतृत्व का संगम
भारत अब केवल एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक दृष्टि, लोकतांत्रिक मूल्य और मानवोन्मुख विकास मॉडल वाला राष्ट्र बनकर दुनिया में सामने आया है। यह वही भारत है जहां
- परंपरा और आधुनिकता का संतुलन,
- विकास और नैतिकता का मेल,
- संस्कृति और विज्ञान का समन्वय,
एक नई विश्व-व्यवस्था का आधार निर्मित कर रहे हैं।
वैश्विक राजनीति के वर्तमान दौर में, जहां विभाजन, संघर्ष और अविश्वास का माहौल बढ़ रहा है, भारत अपने बहुलतावादी समाज और सार्वभौमिक मानव मूल्यों के साथ विश्व मंच को एक वैकल्पिक सकारात्मक रास्ता दिखा रहा है।
निष्कर्ष
सामाजिक सुधार, मानवाधिकार संरक्षण, स्वास्थ्य नेतृत्व और समावेशी विकास के संयुक्त प्रभाव ने भारत की सांस्कृतिक पहचान को और अधिक मजबूती दी है। भारत आज न केवल वैश्विक चुनौतियों का समाधान खोजने में सक्षम है, बल्कि एक ऐसी दृष्टि प्रस्तुत कर रहा है जो “सहयोग, सम्मान और सार्वभौमिक कल्याण” पर आधारित है।
भारत की यह पहल एक ऐसे भविष्य की ओर संकेत करती है, जहां विकास केवल आर्थिक प्रगति नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, सांस्कृतिक गर्व और मानवीय मूल्यों की व्यापक भावना पर आधारित होगा।
