
बेंगलुरु के सदियों पुराने मंदिर ने विवाह समारोह पर लगाई रोक, बढ़ते तलाक और ‘मंदिर कोर्ट’ के दुरुपयोग बने वजह
बेंगलुरु से एक चौंकाने वाली और बहस छेड़ने वाली खबर सामने आई है। शहर के एक सदियों पुराने प्रतिष्ठित मंदिर ने अपने परिसर में विवाह (शादी) आयोजित करने पर अनिश्चितकाल के लिए रोक लगा दी है। मंदिर प्रशासन का कहना है कि हाल के वर्षों में यहां संपन्न हुए विवाहों के बाद तलाक के मामलों में बढ़ोतरी देखी गई है, साथ ही मंदिर परिसर को ‘मंदिर कोर्ट’ की तरह इस्तेमाल किए जाने और निजी विवादों के निपटारे का मंच बनाए जाने की शिकायतें भी लगातार मिल रही थीं। इन्हीं कारणों के चलते यह कठोर फैसला लिया गया है।
अचानक फैसला, मगर लंबी चर्चा के बाद
मंदिर ट्रस्ट के पदाधिकारियों के अनुसार यह निर्णय अचानक नहीं लिया गया, बल्कि पिछले कई महीनों से चली आ रही बैठकों, कानूनी सलाह और स्थानीय प्रशासन से विचार-विमर्श के बाद इस पर अंतिम मुहर लगी। ट्रस्ट का कहना है कि मंदिर का मूल उद्देश्य पूजा, साधना और आध्यात्मिक शांति का केंद्र बने रहना है, न कि घरेलू विवादों या सामाजिक टकरावों का मंच।
ट्रस्ट के सचिव ने एक बयान में कहा, “हम विवाह संस्था के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन हमारे परिसर का जिस तरह व्यावसायीकरण और विवाद-निपटान केंद्र के रूप में इस्तेमाल हो रहा था, वह मंदिर की गरिमा के अनुरूप नहीं था। कई बार दंपती और उनके परिवार मंदिर के भीतर ही आरोप-प्रत्यारोप और समझौते की कोशिशें करते थे, जिससे अशांति फैलती थी।”
‘मंदिर कोर्ट’ का बढ़ता चलन
स्थानीय लोगों के मुताबिक बीते कुछ वर्षों में कुछ जोड़ों और उनके परिजनों का यह चलन बढ़ा कि वे आपसी मतभेदों को मंदिर के प्रांगण में सुलझाने की कोशिश करते, कथित रूप से यह मानते हुए कि “भगवान के सामने” मामला रखने से भावनात्मक दबाव बनेगा और फैसला निकलेगा। धीरे-धीरे यह स्थिति इस हद तक पहुंच गई कि नियमित भक्तों को भी पूजा के दौरान शोरगुल, बहस और तनावपूर्ण माहौल का सामना करना पड़ता था।
ट्रस्ट को शिकायतें मिली थीं कि मंदिर के वरिष्ठ पुजारी, ट्रस्टी या कुछ प्रभावशाली स्थानीय लोग अनौपचारिक मध्यस्थ की भूमिका निभाने लगे थे, जो कि न तो कानूनी तौर पर उचित था और न ही धार्मिक संस्थान की भूमिका के अनुकूल।
तलाक के आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता
मंदिर प्रशासन का यह भी दावा है कि पिछले कुछ वर्षों में यहां संपन्न विवाहों के बाद अलगाव और तलाक के मामले अपेक्षाकृत अधिक देखने को मिले। हालांकि ट्रस्ट ने कोई आधिकारिक आंकड़ा सार्वजनिक नहीं किया, लेकिन उनका कहना है कि लगातार मिल रही शिकायतों और कानूनी नोटिसों से यह स्पष्ट था कि विवाह के बाद रिश्तों में स्थायित्व नहीं टिक पाया।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि किसी एक स्थल पर हुए विवाहों को सीधे तलाक से जोड़ना सांख्यिकीय रूप से कठिन है, लेकिन बार-बार एक ही स्थान से जुड़े मामलों की आवाजाही प्रशासन को चिंतित कर सकती है।
भक्तों की मिली-जुली प्रतिक्रिया
इस फैसले पर भक्तों और स्थानीय समुदाय की प्रतिक्रिया मिली-जुली रही। एक वर्ग का कहना है कि मंदिर का यह निर्णय समयानुकूल और आवश्यक है। “मंदिर पूजा का स्थान है, यहां बाजारू या विवादास्पद गतिविधियां नहीं होनी चाहिए,” एक नियमित भक्त ने कहा।
वहीं, कई लोग इस फैसले से आहत भी हैं। उनका कहना है कि यह मंदिर पीढ़ियों से विवाह का पवित्र स्थल रहा है और हजारों लोगों की पारिवारिक स्मृतियां इससे जुड़ी हैं। कुछ दंपतियों ने भावनात्मक प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि शादी जैसे संस्कार को मंदिर में करने से जीवनभर का जुड़ाव बनता है, और इसे रोकना परंपरा से कटाव जैसा है।
शादी उद्योग पर असर
बेंगलुरु में मंदिर में विवाह कराना एक प्रतिष्ठा और आस्था का विषय माना जाता था। वेडिंग प्लानर्स, कैटरर्स और फोटोग्राफरों पर भी इस फैसले का असर पड़ सकता है, क्योंकि कई परिवार खास तौर पर इस मंदिर में विवाह की योजना बनाते थे। पर्यटन विशेषज्ञों का मानना है कि मंदिर-आधारित विवाहों के बंद होने से शहर के धार्मिक पर्यटन पर भी परोक्ष प्रभाव पड़ सकता है।
क्या यह फैसला कानूनी रूप से टिकाऊ है?
कानून के जानकार बताते हैं कि एक निजी ट्रस्ट को अपने परिसर के उपयोग पर नियम बनाने का अधिकार है, बशर्ते वे भेदभावपूर्ण न हों और किसी संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन न करें। चूंकि यह फैसला सभी पर समान रूप से लागू किया गया है, इसलिए इसे कानूनी चुनौती मिलना मुश्किल है। हालांकि यदि कोई दंपती यह सिद्ध कर दे कि पहले से स्वीकृत बुकिंग अनुबंध उल्लंघन के तहत रद्द की गई है, तो मुआवजे का दावा किया जा सकता है।
अपवाद और वैकल्पिक व्यवस्था
ट्रस्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि जिन परिवारों ने पहले से बुकिंग करा रखी थी, उनके मामलों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जाएगा। कुछ मामलों में वैकल्पिक तारीखें, दूसरी जगह या धनवापसी जैसे विकल्प दिए जाएंगे। मंदिर प्रशासन भविष्य में सीमित धार्मिक अनुष्ठानों—जैसे गृहप्रवेश पूजा, संकल्प या आशीर्वाद कार्यक्रम—की अनुमति पर विचार कर सकता है, लेकिन विवाह जैसे बड़े आयोजन फिलहाल वर्जित रहेंगे।
व्यापक बहस: परंपरा बनाम प्रबंधन
यह निर्णय केवल एक मंदिर तक सीमित मुद्दा नहीं है। देशभर में धार्मिक स्थलों के प्रबंधन और उनके व्यावसायीकरण पर बहस पहले से चल रही है। कई मंदिर, मस्जिद और गिरिजाघर अब भीड़ प्रबंधन, सुरक्षा, स्वच्छता और कानून-व्यवस्था के दबावों से जूझ रहे हैं। शादी जैसे बड़े आयोजनों से इन चुनौतियों में वृद्धि होती है।
सामाजिक वैज्ञानिकों का मानना है कि यह घटना एक बड़े बदलाव का संकेत हो सकती है—जहां धार्मिक संस्थान अपने मूल उद्देश्य पर लौटने की कोशिश कर रहे हैं और गैर-धार्मिक गतिविधियों को सीमित कर रहे हैं।
आगे क्या?
फिलहाल, मंदिर प्रशासन अपने फैसले पर अडिग नजर आ रहा है, लेकिन उन्होंने यह भी कहा है कि भविष्य में समुदाय और विशेषज्ञों से बातचीत के बाद नीति में संशोधन किया जा सकता है। वहीं, राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन ने इस पर टिप्पणी करने से बचते हुए कहा कि वे स्थिति पर नजर रखे हुए हैं।
निष्कर्षतः, बेंगलुरु के इस मंदिर का फैसला धार्मिक स्थलों की भूमिका, परंपराओं के बदलते स्वरूप और आधुनिक समाज की चुनौतियों के बीच संतुलन साधने की एक कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अन्य धार्मिक संस्थान भी इसी राह पर चलते हैं, या फिर समुदाय के दबाव में कोई मध्य मार्ग निकलेगा।
