
उत्तर प्रदेश में कफ सिरप रैकेट का खुलासा — यूपी पुलिस ने एक बड़े अवैध कफ-सिरप रैकेट का भंडाफोड़ किया; 3.5 लाख बोतलें जब्त, कई गिरफ्तार, SIT ने स्तर पर जाँच शुरू की।
मामला क्या है — आंकड़े, खुलासे, बरामदगियाँ
- प्रदेश में कोडीन युक्त कफ सिरप — जिसे आमतौर पर नशीली दवाओं (नार्कोटिक) की श्रेणी में माना जाता है — की अवैध तस्करी, भंडारण और बिक्री का एक बड़ा नेटवर्क पकड़ा गया है।
- पुलिस और औषधि प्रशासन ने संयुक्त छापेमारी में अब तक लगभग 3.5 लाख बोतल (codeine-based cough syrup) जब्त की हैं; जिनकी अनुमानित बाजार कीमत करीब ₹4.5 करोड़ बताई गई है।
- इस सिलसिले में कुल 32 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है।
- राज्य सरकार ने मामले की गंभीरता को देखते हुए एक विशेष जांच दल (SIT) गठित किया है, जो इस पूरे रैकेट की जड़ से जांच करेगा — चाहे वह वित्तीय लेन-देन हो, अंतर-राज्यीय तस्करी नेटवर्क हो, या नशीली दवाओं की अवैध आपूर्ति हो।
इस प्रकार यह अब तक का सबसे बड़ा कफ-सिरप रैकेट है जिसे यूपी में पकड़ा गया है।
कैसे हुआ खुलासा — ऑपरेशन और जांच
- अधिकारियों ने बताया कि यह कार्रवाई कई जिलों में — फ़ार्मा गोदामों, मेडिकल स्टोर्स और सप्लायर नेटवर्क सहित — की गई थी। कुछ स्टोरों पर बड़े पैमाने पर सीलिंग और छापेमारी हुई।
- बताया गया है कि तस्करी के लिए सिरप को वैध लगने वाले कागजात, फर्जी पर्चे, और लाइसेंस-रहित बिक्री का सहारा लिया जा रहा था। कुछ मामलों में सिरप को अनधिकृत दुकानों पर बिना प्रिसक्रिप्शन बेचा जा रहा था।
- कई “सुपर-स्टॉकिस्ट” (बड़े थोक विक्रेता/होलसेलर) इस रैकेट से जुड़े पाए गए — जिनमें से कम-से-कम तीन मुख्य आरोपी — Bhola Jaiswal (वाराणसी), Vibhor Rana (सहारनपुर), और Saurabh Tyagi (गाज़ियाबाद) — गिरफ्तार हुए हैं।
- लेकिन, जांच से पता चला है कि रैकेट सिर्फ प्रदेश तक सीमित नहीं है। बरामदगी और ट्रेल से संकेत मिले हैं कि इसे अंतर-राज्यीय और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क — नेपाल व बांग्लादेश तक — तक जुड़े हुए थे।
- सरकार की ओर से कहा गया है कि पुलिस सिर्फ तस्करों को ही नहीं, बल्कि इस पूरे आपूर्ति एवं वितरण श्रृंखला — गोदाम मालिकों, ड्रग् कंपनियों, वितरकों, मार्केटिंग एजेंटों तक — की तह-तक जाँच कर रही है। कानूनी कार्रवाई और SIT का गठन
- 8–9 दिसंबर 2025 को, उत्तर प्रदेश सरकार ने एक तीन सदस्यों वाली विशेष जांच टीम (SIT) बनायी — इसके अध्यक्ष एक IG-स्तर के अधिकारी होंगे, साथ में राज्य के फ़ूड एवं ड्रग् एडमिनिस्ट्रेशन (FSDA) विभाग के अधिकारी भी शामिल होंगे।
- राज्यों के मुख्यमंत्रियों और पुलिस नेतृत्व द्वारा इस कार्रवाई को “जीरो-टॉलरेंस” नीति का हिस्सा कहा गया है। राज्य ने इस अवैध कारोबार को न सिर्फ अपराध, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती माना है।
- अब तक करीब 128 FIR (First Information Report) दर्ज की गई हैं, जो 28 जिलों में फैली हुई हैं।
- आरोपों के तहत यह मामला सिर्फ दवा-कानून (Drugs & Cosmetics Act) तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें नशीली दवाओं की तस्करी एवं वितरण को कवर करने वाले क़ानून — Narcotic Drugs and Psychotropic Substances Act (NDPS Act) — की भी धाराएँ लगाई गई हैं।
- SIT को एक महीने में प्रारंभिक रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया है। इसके तहत ट्रैकिंग की जाएगी कि ये बोतलें किस फैक्ट्री/गोदाम से आई थीं, किन-किन माध्यमों से बेचने के लिए भेजी गयीं थीं, और वितरण नेटवर्क में कौन-कौन शामिल था। रैकेट का पैमाना और नेटवर्क — राज्य सीमा पार तक पहुँच
- जांच में यह बात सामने आई है कि यह रैकेट केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं — इसका दायरा अन्य राज्यों तक (जहाँ से सिरप आपूर्ति होती थी) और अंतरराष्ट्रीय सीमा (नेपाल, बांग्लादेश) तक फैला हुआ पाया गया है।
- अधिकारी बता रहे हैं कि प्रतिबंधित सिरप को बड़े पैमाने पर छल-छद्म तरीकों से वैध दिखाकर मेडिकल स्टोर्स या होलसेल डीलरों को दिया जा रहा था। कुछ मामलों में सिरप की खेप को अन्य सामान — जैसे चिप्स, स्नैक्स आदि — के कार्टनों में छुपाकर भेजा जाता था, ताकि चेकिंग में संदेह न हो।
- यह रैकेट न सिर्फ आपूर्ति व तस्करी का है, बल्कि इसके पीछे एक संगठित नेटवर्क — “सुपर-स्टॉकिस्ट/होलसेलर”, “डिस्ट्रिब्यूटर”, “गोदाम”, “ट्रॉकर/सप्लायर” — शामिल था, जो इस दवाओं को बड़े पैमाने पर अवैध रूप से फैलाता था। सार्वजनिक स्वास्थ्य, कानून और राज्य की प्रतिक्रिया
- इस पूरे रैकेट में इस्तेमाल हो रहा सिरप — कोडीन युक्त — आम खांसी-सर्दी की दवा नहीं था, बल्कि नशीले पदार्थों (नार्कोटिक्स) में आता था, जिनका दुरुपयोग नशे के रूप में किया जाता था। इससे सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा को गहरा खतरा था।
- राज्य सरकार ने न सिर्फ इस तस्करी को अपराध माना, बल्कि इसे प्रभावी रूप से रोकने और भविष्य में ऐसे कारोबार को प्रतिबंधित रखने के लिए कड़े कदम उठाए हैं — जिसमें SIT की गठना, लाइसेंसिंग प्रक्रिया की सख्ती, औषधि विभाग की निगरानी आदि शामिल हैं।
- अधिकारियों ने सार्वजनिक रूप से चेतावनी दी है कि नकली पर्चे, फर्जी लाइसेंस, इंटर-स्टोर सप्लाई आदि हर प्रकार की अनियमितता को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, और यदि जरूरत पड़ी तो आपराधिक मुकदमे (NDPS आदि) के साथ-साथ फ़ेडरल एजेंसियों की भी मदद ली जा सकती है। गंभीर सवाल — कैसे हुआ इस व्यापक रैकेट का संचालन?
- जांच में सामने आया है कि इस कफ सिरप रैकेट के पीछे सिर्फ कुछ स्थानीय सप्लायर नहीं, बल्कि बड़े “सुपर-स्टॉकिस्ट / होलसेलर्स” का नेटवर्क था। यह संकेत देता है कि रैकेट का संचालन संगठित रूप से, बड़े पैमाने पर और लंबे समय से हो रहा था।
- यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि सिरप की खेप उन राज्यों से आ रही थी, जहाँ या तो वितरण नियंत्रण कमजोर था, या कागजात/रेगुलेशन की अनदेखी होती थी। फिर इन्हें वैध दिखाकर उत्तर प्रदेश लाया और फिर वहाँ से आगे तस्करी होती।
- इस प्रकार का नेटवर्क — जिसमें गोदाम, वितरक, होलसेलर, कई स्तर शामिल — दर्शाता है कि यह सिर्फ “छोटा फर्जी काम” नहीं था, बल्कि एक systematized organized crime था। इसलिए, केवल कुछ व्यक्तियों को गिरफ्तार करने से काम नहीं चलेगा; पूरा नेटवर्क और उसकी आर्थिक जड़ें उजागर करना होगा, यही काम अब SIT के हाथों में है। निष्कर्ष एवं आगे की दिशा
उत्तर प्रदेश में पकड़ा गया यह कफ-सिरप रैकेट — 3.5 लाख बोतलें, 32 गिरफ्तार, 128 FIRs — अब तक का सबसे बड़ा मामला है। इसने दिखा दिया है कि किस तरह नशीली दवाओं का अवैध व्यापार सामाजिक स्वास्थ्य, कानून व्यवस्था, और सार्वजनिक सुरक्षा के लिए कितना खतरनाक हो सकता है। सरकार और पुलिस ने इस रैकेट से निपटने के लिए त्वरित और कठोर कदम उठाए हैं — SIT का गठन, कड़े कानून लागू करना, लाइसेंसिंग व वितरण प्रणाली की समीक्षा — जो आने वाले दिनों में अन्य राज्यों में भी मिसाल बन सकते हैं।
फिलहाल यह देखना होगा कि SIT अपनी रिपोर्ट में क्या निष्कर्ष लाती है — क्या सिर्फ कुछ ठिकानों पर नियंत्रण बकी रहेगा, या पूरे नेटवर्क की तह-तक सफाई होगी। साथ ही, आम नागरिकों को भी सतर्क रहने की ज़रूरत है — किसी भी दवा को सिर्फ डॉक्टर की पर्ची और वैध मेडिकल स्टोर से ही लेना चाहिए, वरना दवाई नहीं, नशा खरीदने का डर रहेगा।
